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चेहलुम, मानवता को नया जीवन प्रदान करने वाला

    رو تیتر: 

    जो लोग भी इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के इतिहास के बारे में थोड़ा बहुत भी ज्ञान रखते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का क़याम और उनकी शहादत सिर्फ़ अपने समय के शासक के ख़िलाफ़ आंदोलंन तक सीमित नही था। तो यहां पर सवाल यह पैदा होता है कि इस महान आंदोलन का, जिसने चौदह सौ सालों से मानवता पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ने में सफ़लता प्राप्त की है, लक्ष्य क्या था? आज तक किसी भी आंदोलन और शहादत ने अपने आइडियालाजी के ऐतेबार से मानवता की इतना प्रभावित नही किया है, और आज तक मानवता के इतिहास के किसी पहलु पर इतना अध्धयन नही किया गया है और न ही इतने महत्व योग्य समझा गया है। क्या हमारा इस घटना को इतना ज़्यादा अहमियत देना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि हम इसे केवल एक साधारण घटना समझते हैं? उन से पहले न जाने कितने इंसानों ने इस राह में कद़म रखा है लेकिन उनमें से किसी ने हमारे जीवन को इस हद तक प्रभावित नही कर सके हैं।

    सारे मुसलमान व ग़ैर मुसलमान इमाम हुसैन अलैहिस सलाम की शहादत के चालीस दिन बाद चेहलुम के अवसर पर आशूर के दिन की घटना पर पुन: विचार करते हैं ता कि उसके जीवन अता करने वाले संदेशों को दोहरायें, चेहलुम का दिन उन्हे एक बार फिर मारेफ़त के दरिया में डूब जाने की दावत देता है ता कि मानवता अपने आपको उससे सैराब करके अमर हो जाये, करोड़ों लोग उस दिन अर्थात सफ़र के महीने की बीस तारीख़ को ख़ुद को उस याद को ज़िन्दा करने के लिये तैयार करते हैं, चेहलुम के दिनों में लगभग अठ्ठारह मिलियन श्रद्धालु व इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के ज़ायर पैदल पवित्र शहर करबला, जहां इमाम हुसैन अलैहिस सलाम और उनके वफ़ादार साथियों का रौज़ा है, का रुख़ करते हैं और एक महान वातावरण पैदा करते हैं जो इमाम हुसैन अलैहिस सलाम और उनके आंदोलन की अध्यात्मिक शक्ती को दर्शाता है। दिलचस्ब बात यह है कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम की यह अज़ादारी मुसलमानों तक सीमित नही है बल्कि उसमें ईसाई, यहूदी, हिन्दू, बौद्ध आदि धर्मों के लोग शामिल होते हैं। सारे इंसान चाहे वह किसी भी धर्म व मज़हब के हों, किसी भी देश या कौम से ताल्लुक़ रखते हों, जिस तरह से भी उनके लिये संभव होता है वह इसके प्रति अपनी मुहब्बत और श्रद्धा को ज़ाहिर करते हैं और यह साबित करते हैं कि आशूरा और करबला का संदेश किसी धर्म या समुदाय विशेष कर सीमित नही है। हमारे इस कथन की दलील दुनिया के विभिन्न देशों व धर्मों की महान हस्तियों के बयानात हैं उनमें से बहुत से ग़ैर मुस्लिम हैं जिन्होने इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के बारे में अपने ख़्यालात का इज़हार किया है।
    बहुत बार ऐसा देखने में आता है कि जब मुसलमान दूसरे धर्म के लोगों से सवाल करते हैं कि आप लोग क्यों इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का ग़म मनाते हैं जबकि आप का ताल्लुक़ इस्लाम से नही है?
    तो उन्होने मुसलमानों के जवाब में कहा है कि क्या आपको यह लगता है कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम सिर्फ़ मुसलमानों से मख़्सूस हैं? नही ऐसा नही है, हमने भी इमाम हुसैन अलैहिस सलाम और करबला के शोहदा के चमत्कार देखे हैं, हमने उनसे अपनी मन्नतें मांगी हैं और वह पूरी हुई हैं, हमने अपने बीमार की सेहत को उनसे मांगा है और वह सब पूरी हुई हैं।
    निसंदेह इमाम हुसैन अलैहिस सलाम से मन्नत मांगने का लक्ष्य, जैसा कि सब जानते हैं, यह हरगिज़ नही है कि उन्हे उसी तक सीमित कर दिया जाये। अगर हम आशूरा का लक्ष्यों और संदेशों पर बहस करना चाहें तो उसके लिये हमें बहुत सी किताबें लिखनी पड़ेगी। जबकि इस लेख में हम सिर्फ़ कुछ बातों को संक्षिप्त में बयान करना चाहते हैं:

    आज़ादी का संदेश
    आशूरा, इंसानों के अंदर आज़ादी व स्वतंत्रता की आत्मा को जीवित करने का नाम है। हम सब जानते हैं कि इंसान की आत्मा अत्याचार व बे इंसाफ़ी के ख़िलाफ़ है और हमेशा अत्याचारियों और ज़ालिमों के ज़ुल्म का मुक़ाबला करती है। इंसान इंसाफ़ को पसंद करता है। इंसान ने न्याय की ख़ातिर बहुत बलिदान दिया है, बग़ावतें की हैं। बहुत सी जंगें, क्रातियां, बग़ावतें इसी ज़ुल्म के शासन को उखाड़ फेंकने के लिये लड़ी गई हैं। हम यहां पर दो शब्दों के मअना को स्पष्ट करना चाहते हैं: आज़ादगी शब्द में आज़ादी से ज़्यादा मअना पाये जाते हैं, एक आज़ाद व स्वतंत्र इंसान मुमकिन है कि किसी रस्सी में बंधा हुआ न हो मगर वह कुछ ना दिखाई देने वाली रस्सियों में बंधा हो सकता है, आज़ादगी का मतलब है कि इंसान अपने अंदर पाई जाने वाली शराफ़त व करामत को रखता हो। इमाम हुसैन अलैहिस सलाम ने अपने क़याम से हमें आज़ादगी का संदेश दिया है। जिस समय अत्याचारी यज़ीद बिन मुआविया इमाम हुसैन अलैहिस सलाम से ज़बरदस्ती बैअत लेना चाह रहा था तो इमाम हुसैन अलैहिस सलाम ने फ़रमाया: ईश्वर की सौगंध, मैं ज़िल्लत के साथ उसके सामने हाथ नही बढ़ाऊंगा और न ही ग़ुलामों की तरह उसकी हुकुमत के आगे सर झुकाऊंगा। आपके सारे साथियों ने आप ही तरह शहादत के रास्ते को चुनते हुए, आज़ादगी और इज़्ज़त की मौत की ज़िल्लत की ज़िन्दगी पर तरजीह दी और तमाम इंसानों को अपने अमल के ज़रिये यह पैग़ाम दिया कि हमेशा ज़िन्दा रहने का नाम शराफ़त नही है बल्कि कभी कभी आज़ादी व आज़ादगी को हासिल करने के लिये अपनी जान व माल व इज़्ज़त तक को क़ुर्बान करना पड़ता है।

    नस्ली भेदभाव से मुक़ाबला
    आशूरा की घटना में हम यह देखते हैं कि इंसान की क़ीमत का मेयार उसके ईमान के अनुसार होता है। न कि उसके क़ौम व मज़हब व हैसियत के अनुसार। यही कारण है कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम शहादत के समय एक एक सहाबी व अपने साथी के सरहाने पहुचे और उनके सरों को अपनी आग़ोश में लिया, यहां तक कि अपने काले हबशी ग़ुलाम के सरहाने भी पहुचे और उसके सर को अपने दामन में लिया। इंसान हमेशा से एक रंग होने और नस्ली व रंगी, ऊंच नीच, क़ौम व मज़हब के भेदभाव को मिटाने और दूर करने का प्रयत्न करता रहा है और उसने इन सब से बहुत बार मुक़ाबला किया है, आशूरा के संदेश पर अक़ीदा व ईमान रखने वाले लोगों का मक़सद यह है कि इंसान की करामत व बुज़ुर्गी की बुनियाद उसका ईमान है न कि रंग व माल व दौलत आदि .... इस लक्ष्य के साथ आशूरा के मानने वाले इस आंदोलन को ज़िन्दा रखने के लिये कोशिश करते हैं ता कि एक दूसरे से नज़दीक हो सकें और बे बुनियाद बातों का ख़ातमा कर सकें और इस यकरंगी का सबसे बड़ा उदाहरण चेहलुम के दिनों में करबला तक का सफ़र पैदल तय करना है जिस में सारे देशों के लोग ईरानी, अरब, एशियन, युरोपयिन, अमेरिकन आदि ... बिना किसी पहचान के शिरकत करते हैं, बड़े और छोटे लोगों में कोई भिन्नता नही पाई जाती है और सब इस बराबरी से आनंदमय होते हैं।

    ईसार व क़ुर्बानी का संदेश
    ईसार का मतलब ख़ुद को या किसी चीज़ को दूसरे के हवाले कर देना है। अगर हम चाहें कि आशूरा के दिन की तारीफ़ एक लफ़्ज़ में करें तो ईसार का शब्द उचित मालूम होता है। इस लिये कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम ज़ालिम यज़ीद के हाथ पर बैअत करके अपनी व अपने साथियों और घर वालों की जान बचा सकते थे लेकिन सिर्फ़ जान व माल बचा लेना इंसान की ज़िन्दगी का मक़सद नही होता। इमाम अलैहिस सलाम का मुक़ाबला करना, हालांकि आपको मालूम था कि इसका नतीजा आपकी और आपके साथियों की शहादत और घर वालों की क़ैद की सूरत में सामने आयेगा, इस लिये था कि ताकि इंसानी संस्कारों की रक्षा हो सके और इंसान के अंदर ईसार व क़ुर्बानी का ज़ज़्बा पैदा हो जाये। इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के चाहने वालों ने अपने अंदर ईसार व क़ुर्बानी के ज़ज़्बे को पैदा किया ता कि वह अपने अंदर पाये जाने वाले इंसानी संस्कारों को मज़बूत कर सकें और इंसानियत के महान लक्ष्य, ख़ुद को सम्पूर्ण इंसान बनाना, को प्राप्त कर सकें।

    नफ़्स की बुराइयों से मुक़ाबला
    सबसे मुश्किल जंगों और मुक़ाबलों में से एक जंग और मुक़ाबला इंसान का अपने नफ़्स की ख़्वाहिशों व मन मानियों से लड़ना है। इंसान का वुजूद आराम पसंद होता है। नफ़्स ख़ुद को दूसरों पर तरजीह देता है, ख़ुद को दूसरों से बड़ा समझता है। आशूरा के आंदोलन में उन लोगों ने शिरकत की जो अपने नफ़्स से जिहाद कर चुके थे और अपनी ज़ाती इच्छाओं व ख़्वाहिशों को ख़त्म कर चुके थे और उनके अंदर सिर्फ़ जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने (अध्यात्म की बुलंदी व ईश्वर की चाहत) के अलावा कोई चाहत नही थी। हमारी इस बात की दलील यह है कि उन लोगों ने अपने इस लक्ष्य को पाने के लिये अपनी सारी चीज़ों को क़ुर्बान कर दिया, इस तोहफ़े को दुनिया के सामने पहुचाने के लिये सारी चीज़ों को न्योछावर कर दिया। उदाहरण के तौर पर इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के भाई हज़रत अब्बास अलैहिस सलाम जब पानी लाने के लिये नहरे फ़ुरात पर गये और दरिया में क़दम रखा तो कई दिन की प्यास के बावजूद आपने पानी को मुंह नही लगाया, क्यों इस लिये कि आप इमाम, उनके साथियों और घर वालों से पहले पानी नही पीना चाहते थे। लेकिन अफ़सोस के पानी ख़ैमों तक पहुचाने से पहले ही आप शहीद हो गये और प्यासे ही इस दुनिया से रुख़्सत हो गये।
    इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का चेहलुम भी इंसानों के ईसार व क़ुर्बानी का नमूनों में से एक है जिसकी बुनियाद आशूरा की तालीमात हैं। इस लिये कि अपने आराम को छोड़ देना, सख़्तियों और परेशानियों को बर्दाश्त करना, अज़ादारी की रस्मों में शरीक होना और इसी तरह से करबला की तरफ़ सफ़र करने के लिये अपने नफ़्स को ख़्वाहिशों को कुचल देना है। बहुत से ज़ुल्म और बें इंसाफ़ियां इंसान के नफ़्स की बेजा ख़्वाहिशों के नतीजे में सामने आते हैं। आशूरा के मानने वाले इस बे नज़ीर क्रांति के ज़रिये अपने नफ़्स के साथ जिहाद करते हैं ताकि वह अपनी जिन्दगी में कभी भी ज़ुल्म व बे इंसाफ़ी का शिकार न हों।
    और आख़िर में यह जो कुछ भी ज़िक्र हुआ यह सिर्फ़ एक बूंद है उस समुंदर की, जो आशूरा के संदेशों से भरा हुआ है। ज़ाहिर है कि इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का चेहलुम इंसानियत की आत्मा व सदाचार को ज़िन्दा करने वाला है, यह ऐसी क़ीमती चीज़ है कि जिससे बहुत से इंसान ग़ाफ़िल हैं जबकि वह इस घटना के संदेश से दोबारा उसे ज़िन्दा कर सकते हैं।

     

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